शीर्षक: संविदा की फाइल में बंद एक ज़िंदगी – HIV/AIDS कर्मचारियों का दर्द

शीर्षक: संविदा की फाइल में बंद एक ज़िंदगी – HIV/AIDS कर्मचारियों का दर्द
रात के 10 बजे हैं। शहर की बस्तियों में लाइटें बुझ चुकी हैं, लेकिन एक काउंसलर के पास अभी भी रजिस्टर खुला है। सामने बैठा एक युवा है जो पहली बार टेस्ट कराने आया है और डर से काँप रहा है। काउंसलर उसे समझाती है, “डरिए मत, इलाज संभव है। आप अकेले नहीं हैं।”
वो ये बातें रोज़ कहती है। पर जब वो घर लौटती है तो अपने बच्चे से झूठ बोलती है कि “मैडम, आज ऑफिस में देर हो गई थी।” सच ये है कि वो एक HIV/AIDS प्रोजेक्ट की संविदा कर्मचारी है। तनख्वाह 12 से 18 हजार। काम 24 घंटे वाला।
1. नाम प्रोजेक्ट का, पहचान अस्थायी की
इन कर्मचारियों को हम NACO, SACS और विभिन्न NGO के तहत काम करने वाले “फील्ड स्टाफ” कहते हैं।
पद: आउटरीच वर्कर, पीयर एजुकेटर, ICTC काउंसलर, STI counsellor, लैब टेक्नीशियन, Art counsellor , प्रोग्राम मैनेजर
नियुक्ति: संविदा पर। हर साल टेंडर बदलता है, साथ में नौकरी भी।
वेतन: कई राज्यों में 10-15 साल से वही वेतन है। महंगाई बढ़ी, पर वेतन नहीं।
एक पीयर एजुकेटर जिसे “टार्गेटेड इंटरवेंशन” में सबसे खतरनाक इलाकों में जाना होता है, वो 11 हजार में अपने परिवार का पेट पालता है। पेट्रोल, फोन का खर्च, बाइक की EMI, सब उसी में से।
2. काम जोखिम का, सुरक्षा कागज की
इनका काम सिर्फ फॉर्म भरना नहीं है।
- रेड लाइट एरिया में जाकर जागरूकता करना
- माइग्रेंट मजदूरों को टेस्ट के लिए मनाना
- ART सेंटर तक मरीज को पहुँचाना
- स्टिग्मा के बीच में खड़े होकर कहना कि “HIV छूने से नहीं फैलता”
कोरोना में जब सब घर बैठे थे, ये घर-घर दवाई पहुँचा रहे थे। PPE नहीं मिला, सम्मान नहीं मिला। कई बार पुलिस ने भी रोका, “तुम कहाँ जा रहे हो?”
रिस्क अलाउंस के नाम पर कुछ नहीं। बीमा के नाम पर सिर्फ एक कार्ड जो हर साल रिन्यू होने के डर से लटका रहता है।
3. सबसे बड़ा दर्द: अनदेखा होना
सबसे तकलीफ तनख्वाह से नहीं, तिरस्कार से होती है।
घर में: “सरकारी नौकरी कब लगेगी?” रिश्तेदार पूछते हैं। बताने में शर्म आती है कि 15 साल से “संविदा” ही है।
डिपार्टमेंट में: फाइल में इनका नाम आखिरी पन्ने पर। परफॉर्मेंस रिपोर्ट में टार्गेट 100% चाहिए। अगर एक मरीज भी ART नहीं लेता तो कारण पूछा जाता है। पर वेतन 6 महीने लेट हो जाए तो “टेंडर प्रोसेस में है” कह दिया जाता है।
समाज में: जिस मरीज की इन्होंने ज़िंदगी बचाई, वही कभी पीठ पीछे कहता है “ये तो NGO वाले हैं”।
एक काउंसलर ने कहा था, “हम मरीजों को हिम्मत देते हैं कि वो अपना स्टेटस स्वीकारें। पर हम खुद अपना स्टेटस स्वीकार नहीं कर पाते। हम ‘जरूरी’ भी हैं और ‘अस्थायी’ भी।”
4. फिर भी क्यों लगे हैं?
क्योंकि छोड़ नहीं सकते।
किसी विधवा को जब पहली बार ART मिलती है और वो रोकर पैर छूती है, उस पल के लिए ये सब सहते हैं।
किसी युवा को जब पता चलता है कि समय पर इलाज से वो सामान्य जीवन जी सकता है, उस उम्मीद के लिए ये सड़क पर उतरते हैं।
ये लोग सिस्टम और इंसान के बीच की आखिरी कड़ी हैं। अगर ये हट गए तो आंकड़े तो बन जाएंगे, पर मरीज गायब हो जाएगा।
अंत में
HIV को हराने की लड़ाई में भारत ने बहुत तरक्की की है। पर उस लड़ाई के सिपाही आज भी संविदा पर हैं।
उन्हें परमानेंट नौकरी चाहिए, ये मांग नहीं है। सम्मान चाहिए। समय पर वेतन चाहिए। ESI, PF, ग्रेच्युटी चाहिए। सबसे ज्यादा, ये भरोसा चाहिए कि जिस काम के लिए वो अपनी जान और इज्जत दांव पर लगा रहे हैं, उस काम की कीमत सिस्टम भी समझता है।
जब तक एक काउंसलर को अपने बच्चे की फीस के लिए उधार लेना पड़ेगा, तब तक हमारा हेल्थ सिस्टम अधूरा है।
क्योंकि बीमारी का इलाज दवाई से होता है, और इंसानियत का इलाज इज्जत से।
संवाददाता
डॉक्टर आशीष कुमार शर्मा (काउंसलर) की कलम से सुरक्षा क्लिनिक , लिंक ART