संविदा की फाइल में बंद एक ज़िंदगी: HIV/AIDS से जुड़े कर्मचारियों का दर्द

संविदा की फाइल में बंद एक ज़िंदगी: HIV/AIDS से जुड़े कर्मचारियों का दर्द
विगत तीन माह से वेतन न मिलने पर आर्थिक संकट में काउंसलर व अन्य कर्मचारी
रात के 10 बजे हैं। शहर की बस्तियों में लाइटें बुझ चुकी हैं, लेकिन एक काउंसलर के पास अभी भी रजिस्टर खुला है। सामने बैठा एक युवा है, जो पहली बार HIV टेस्ट कराने आया है और डर से कांप रहा है। काउंसलर उसे समझाता है—“डरिए मत, समय पर जांच और इलाज से सामान्य जीवन संभव है। आप अकेले नहीं हैं।”
वह यह बात रोज़ कई लोगों को समझाता है, लेकिन जब घर लौटता है तो उसके सामने अपनी ही जिंदगी का संघर्ष खड़ा होता है। HIV/AIDS परियोजनाओं से जुड़े कई संविदा कर्मचारियों को विगत तीन माह से वेतन नहीं मिला है। ऐसे में कम वेतन में परिवार का खर्च चला रहे कर्मचारियों के सामने बच्चों की फीस, मकान का किराया और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है।
नाम प्रोजेक्ट का, पहचान अस्थायी की
HIV/AIDS नियंत्रण और जागरूकता कार्यक्रमों में NACO, SACS और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से आउटरीच वर्कर, पीयर एजुकेटर, ICTC काउंसलर, STI काउंसलर, लैब टेक्नीशियन, ART काउंसलर और प्रोग्राम मैनेजर जैसे कर्मचारी वर्षों से कार्य कर रहे हैं।
इनमें से अधिकांश कर्मचारियों की नियुक्ति संविदा पर होती है। हर वर्ष परियोजना और टेंडर प्रक्रिया से जुड़ी अनिश्चितता बनी रहती है। कई कर्मचारियों का कहना है कि वर्षों से वेतन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है।
कम वेतन में कर्मचारियों को फील्ड में जाकर जागरूकता कार्यक्रम चलाने, लोगों को HIV जांच के लिए प्रेरित करने और मरीजों को इलाज से जोड़ने जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने पड़ते हैं।
जोखिम भरा काम, लेकिन सुविधाएं सीमित
इन कर्मचारियों का कार्य केवल कार्यालय या फॉर्म भरने तक सीमित नहीं है। वे रेड लाइट एरिया, दूरदराज की बस्तियों और विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में जाकर लोगों को HIV/AIDS के प्रति जागरूक करते हैं। माइग्रेंट मजदूरों को जांच के लिए प्रेरित करना, HIV संक्रमित व्यक्तियों को ART सेंटर तक पहुंचाना और समाज में फैले भेदभाव के खिलाफ जागरूकता फैलाना उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
कोरोना काल में भी कई कर्मचारियों ने मरीजों तक दवाइयां पहुंचाने और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का काम किया।
तीन माह से वेतन नहीं, कैसे चले घर?
कर्मचारियों का कहना है कि पिछले तीन माह से वेतन नहीं मिलने के कारण उनके सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। परिवार चलाने के लिए कई कर्मचारियों को उधार लेना पड़ रहा है। बच्चों की पढ़ाई, मकान किराया, बिजली बिल और दैनिक खर्च अब चिंता का विषय बन चुके हैं।
एक काउंसलर का कहना है,
“हम मरीजों को हिम्मत देते हैं कि वे कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद न छोड़ें, लेकिन तीन महीने से वेतन नहीं मिलने के कारण आज हम स्वयं आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं।”
सबसे बड़ा दर्द: अनदेखा होना
संविदा कर्मचारियों का कहना है कि उनसे कार्य के दौरान पूरी जिम्मेदारी और लक्ष्य प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है। मरीजों की संख्या, जांच, उपचार और फॉलोअप से संबंधित कार्यों में कोई कमी स्वीकार नहीं की जाती। लेकिन जब वेतन में देरी होती है तो कर्मचारियों को टेंडर और प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला देकर इंतजार करने के लिए कहा जाता है।
एक कर्मचारी ने कहा,
“हम जरूरी भी हैं और अस्थायी भी। मरीजों की जिंदगी से जुड़ा काम करते हैं, लेकिन हमारी अपनी नौकरी और वेतन हमेशा अनिश्चितता में रहता है।”
फिर भी क्यों डटे हैं कर्मचारी?
इन कर्मचारियों के लिए यह केवल नौकरी नहीं, बल्कि सेवा का कार्य भी है। जब कोई HIV संक्रमित व्यक्ति समय पर इलाज मिलने के बाद सामान्य जीवन की ओर लौटता है, जब किसी व्यक्ति का डर दूर होता है और वह उपचार शुरू करता है, तो यही संतुष्टि कर्मचारियों को लगातार काम करने की प्रेरणा देती है।
ये कर्मचारी स्वास्थ्य व्यवस्था और मरीज के बीच महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इनकी सेवाओं के बिना HIV/AIDS नियंत्रण कार्यक्रमों को जमीनी स्तर पर प्रभावी रूप से चलाना कठिन हो सकता है।
कर्मचारियों की प्रमुख मांगें
HIV/AIDS परियोजनाओं से जुड़े संविदा कर्मचारियों की मांग है कि—
- विगत तीन माह का लंबित वेतन तत्काल प्रदान किया जाए।
- भविष्य में वेतन का भुगतान समय पर सुनिश्चित किया जाए।
- वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा सुनिश्चित हो।
- कर्मचारियों को ESI, PF और अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
- लंबे समय से कार्यरत अनुभवी कर्मचारियों को उचित सम्मान और सुविधाएं प्रदान की जाएं।
अंत में
HIV/AIDS से लड़ाई में भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। लेकिन इस लड़ाई को जमीन पर सफल बनाने वाले कई कर्मचारी आज भी संविदा व्यवस्था और वेतन की अनिश्चितता से जूझ रहे हैं।
जब मरीजों को हिम्मत देने वाला काउंसलर स्वयं अपने बच्चों की फीस और घर के खर्च के लिए परेशान हो, तो यह केवल एक कर्मचारी की समस्या नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
बीमारी का इलाज दवाई से होता है, लेकिन इंसानियत का इलाज सम्मान और संवेदना से होता है।
डॉ. आशीष कुमार शर्मा (काउंसलर) की कलम सेसुरक्षा क्लिनिक, लिंक ART