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हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रहे जगदगुरू स्वामी श्री कृपालु जी महाराज के प्रमुख प्रचारक स्वामी युगल शरण जी के विलक्षण दार्शनिक प्रवचन के द्वितीय दिवस

हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रहे जगदगुरू स्वामी श्री कृपालु जी महाराज के प्रमुख प्रचारक स्वामी युगल शरण जी के विलक्षण दार्शनिक प्रवचन केदिनांक 1.12.25दिन सोमवार को  द्वितीय दिवस में स्वामी जी ने बताया कि प्रत्येक जीव आस्तिक होते है, जिसको प्रमाणित करते हुए कहा कि


१.बिना प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता
दर्शन शास्त्र कहता है- प्रयोजनमनुद्दिश्य मंदोऽपि न प्रवर्तते । अर्थात् संसार में कोई भी जीव बिना प्रयोजन से कोई भी कार्य नहीं कर सकता। जो कुछ भी करता है, उसका कोई कारण जरूर होगा। एक पागल का भी कारण है। कार्य अनंत होते हुए भी प्रयोजन एक ही है। परोपकार रूपी कार्य से सन्त और भगवान को सुख मिलता है और पर अपकार रूपी कार्य से दुष्ट को क्षणभंगुर सुख मिलता है। अतएव ये सिद्ध हुआ कि सुख प्राप्ति सबका प्रयोजन है। प्रत्येक जीव आनन्द प्राप्ति हेतु ही कार्य करता है। हम जो कर्म करते हैं, वह दो प्रकार की है- शारीरिक कर्म, शारीरिक प्लस मानसिक कर्म ।
२.हम कौन है और हमारा कौन है ?
हमने सुना है कि हम आत्मा हैं, लेकिन हमारा अनुभव नहीं है, इसलिए हम मानते नहीं कि मैं आत्मा हूँ। जब हमलोग यह नहीं जानते हैं कि मैं कौन हूँ, तो मेरा कौन है कैसे जानेंगे? मेरा माने ‘मैं’ का। हम बोलते हैं कि यह मेरा शरीर है। अर्थात् एक हम और एक हमारा शरीर । हमने अपने आपको शरीर माना और इसे सुख देने का लक्ष्य बना लिया। यदि आपने आपको आत्मा मानते, तो फिर आत्मा को सुखी कैसे किया जायेगा, यह हमारा लक्ष्य होता । जब मैं आत्मा हूँ तो ‘मैं’ का कौन होगा? परमात्मा या भगवान। हमने तो अभी तक नहीं जाना कि मैं कौन हूँ?
३.जो अपने आपको नहीं जानता है, उसको पागल कहते हैं ।
जो अपने आपको नहीं जानता है, वह पागल है। क्योकि जब किसी को पूछा जाता है, वह कौन है ? वह अपना नाम, पदवी जाति बताता है। हम यह सब नहीं हैं। हम संसार रूपी पागलखाना में रहते हैं। परंतु इस जगत में रहने वाले संत जो हमारे इलाज के लिए आते हैं, वे भी पागल हैं। संत कैसे पागल हैं ? वे तो हमसे भी अधिक पागल है। लेकिन दोनों के पागलपन में थोड़ा सा अंतर है। हम संसार के पीछे पागल हैं और संत संसार बनानेवाले के पीछे पागल है ।
हमारा वास्तविक सम्बंधी कौन है ?
भगवान ही हमारा वास्तविक सम्बंधी है। सम्बंध का अर्थ है सम्यक् बन्धन अर्थात परिपूर्ण बन्धन । जो बन्धन सदा के लिए हो । संसार का सम्बंध स्वार्थ युक्त और अनित्य है । सारा बन्धन संसार का स्वार्थ पर टिका हुआ है । स्वार्थ का भी उत्तरोतर क्रम होता है- पड़ोसी ,नौकर ,दोस्त, भाई-पिता ,- माता -स्त्री-पति। ये बन्धन केवल शरीर तक सीमित है । भगवान हमारा नित्य संबंधी है । उनके साथ हमारा नि:स्वार्थ संबंध है । उनका उपकार ! माँ का गर्भ में डालना , आत्मा को डालना , शरीर बनाना, क्या खाएगा धरती पर आकर इसकी व्यवस्था करना आदि । भगवान सब कार्य करने की शक्ति देते हैं, सदा हमारे साथ-साथ रहते हैं, सभी जीवों के पूर्व जन्म का हिसाब-किताब रखते हैं, कर्मो का फल देते हैं । सब के लिए एक ही व्यवस्था । सब पर बराबर कृपा। दंड़ भी कृपा है।
५.विश्व का प्रत्येक जीव आस्तिक है।
करोड़ों कल्प परिश्रम करके भी कोई नास्तिक नहीं बन सकता क्योंकि प्रत्येक अनीश्वरवादी आनन्द को तो मानता ही है और आनंद ही ईश्वर का पर्यायवाची है। इसलिए जो आनंद चाहता है, स्वयं ही ईश्वरोपासक सिद्ध हो जाता है। उसका ईश्वरीय गुणों से प्रेम भी ईश्वर को सिद्ध करता है। बाल्मीकि ने कहा है-
लोके न हि स विद्येत यो न राममनुव्रतः ।।
विश्व में एक भी ऐसा जीव नहीं जो राम का अनुयायी न हो। अनुव्रत का अर्थ होता है जो पक्का चेला है राम का ईश्वर प्राप्ति का मार्ग न जानने के कारण उनका प्रयत्न विपरीत हो सकता है, परंतु वह ईश्वर को मानता ही है। यदि कोई प्रतिज्ञा भी करे कि मैं ईश्वर का विरोध करूंगा, तब तो ये सिद्ध होता है। कि वह प्रकांड़ आस्तिक है।
६.हमारा वास्तविक लक्ष्य आनन्द प्राप्ति ही है।
कुछ दार्शनिकों का मत हैं कि जीवन, ज्ञान, स्वतंत्रता, सब पर शासन करना तथा आनंद आदि पाँच लक्ष्य है। एक ही लक्ष्य नहीं है। परंतु ये समझना चाहिए कि ये सब लक्ष्य उसी आनंद प्राप्ति के हेतु ही होते हैं। अतएव ये सिद्ध हुआ कि विश्व का प्रत्येक जीव एकमात्र आनंद के लक्ष्य से ही कार्य करता हैं।बच्चा पैदा होने के समय रोता है आनंद पाने के लिए। रोकर दुःख को कम करता है। तो रोने में भी सुख, हँसने में भी सुख। खड़े होने में सुख, बैठने में भी सुख, सोने में सुख, जागने में सुख। कभी चुप रहने में सुख कभी शोर में सुख मिलता है। दो विरोधी क्रियायें । ईश्वरीय क्षेत्र में भी जितना सुख संयोग में मिलता है, उससे ज्यादा सुख वियोग में रोने से मिलता है। लेकिन हम चाहते हैं सुख । प्रत्येक व्यक्ति प्रतिक्षण कर्म करता है एकमात्र आनंद पाने के लिए। कोई भी एक क्षण के लिए अकर्मा नहीं रह सकता। गीता में कहा गया है-
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत।
७.प्रत्येक जीव आनंद ही चाहता है, इसका भी कारण है ।
विश्व में सर्वत्र वैमत्य और वैषम्य के बावजूद भी अल्पज्ञ से लेकर सर्वज्ञ तक , बिना किसी के सिखाये ही प्रत्येक जीव एकमात्र आनंद क्यों चाहता है, इसका एक महान वैज्ञानिक रहस्य है कि ब्रह्म या भगवान आनंदस्वरुप है-
आनंद ब्रह्मेति व्याजानात् ।आनंदाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविन्तीति ।
( तैत्तिरीयोपनिषद्‍-३.६)
जीव उसी आनंदस्वरुप भगवान का सनातन अंश है और अपनी अंशी के स्वभाव से युक्त होने के कारण केवल आनंद ही चाहता है । इसलिए कहा गया है-
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। (गीता- १५.७)
८.आनंद की क्या परिभाषा है ?
यो वै भूमा तत्सुखम् ।
( छान्दोग्योपनिषद – ७.२३.१ )
यह आनंद अनंतमात्रा का और अनंतकाल के लिए होता है, सीमित मात्रा का नहीं। यह प्रतिक्षण वर्धमान और इसके ऊपर कभी भी दुःख का अधिकार नहीं होता है।
९.यह आनंद हमको कहाँ मिलेगा ?
आनंद प्राप्ति के लिये विश्व में जितने भी वादों के विवाद चल रहे हैं, उनको हम दो वादों में विभक्त कर सकते हैं। एक भौतिकवाद और दूसरा अध्यात्मवाद । भौतिकवाद के ऊपर अनेक गवेषणा होने के बाद पता चला कि भौतिकवाद की उन्नति से अन्तःकरण की शुद्धि सर्वथा असम्भव है और उसके बिना सुख-शान्ति की आशा रखना व्यर्थ है। अध्यात्मवाद के ऊपर विचार करके देखा गया है और इस पर वेद कहता है-
रसो वै सः ।
(तैत्तिरीयोपनिषद – २.७)
अर्थात् ईश्वर ही आनंद है, उसे प्राप्त करके जीव आनंदमय हो सकता है।
१०.कुछ दार्शनिकों ने सुख को लेकर कई सिद्धान्त बताए हैं।
हमारे भारत में १२ दर्शनों के वाद हैं। सहजवाद, आदर्शवाद, बहुलवाद, सापेक्षवाद, मार्कसवाद, फासिस्टवाद, कार्लवाद आदि अनेक वाद हैं । ६ आस्तिक दर्शन और ६ नास्तिक दर्शन हैं । ६ नास्तिक दर्शन- चार्बाक दर्शन, बौद्ध दर्शन (माध्यमिक, सौतांत्रिक, वैभाषिक और योगाचार), छठा दर्शन जैन दर्शन। चार्बाक दर्शन ने यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् को माना बौद्ध दर्शन ने शून्यवाद के द्वारा तत्वज्ञान से मुक्ति को सुख माना, जैन दर्शन ने निवृत्ति को सुख माना। भारत में प्रचलित ६ आस्तिक दर्शन हैं- सांख्य, न्याय, वैशेषिक, योग, मीमांसा, वेदान्त । वेदान्त को छोड़ कर बाकी ५ दर्शन दुःख निवृत्ति को अपना लक्ष्य मानते हैं। योग चित्तवृत्ति का निरोध को अपना लक्ष्य मानते हैं। सांख्य दर्शन कहता है- यह दुःख तीन प्रकार का होता है- आध्यात्मिक (दैहिक), आधिभौतिक (भौतिक), आधिदैविक । आध्यात्मिक दुःख दो प्रकार का है- शारीरिक और मानसिक । दुःख निवृत्ति आनन्द प्राप्ति का ही द्योतक है । वेदान्त दर्शन को ब्रह्मसूत्र या उत्तर मीमांसा भी कहते हैं, जिसका लक्ष्य आनंद प्राप्ति है ।
निष्कर्ष यही है कि प्रत्येक जीव का चरम लक्ष्य आनंद प्राप्ति ही है ।

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