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ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के तृतीय दिवस  जीव को नास्तिक क्यों कहा जाता है स्वामी युगल शरण

ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के तृतीय दिवस स्वामी युगल शरण का स्वागत माल्यार्पण और पुष्पगुच्छ के माध्यम से किया गया तत्पश्चात स्वामी अपनी अद्वितीय शैली में हमारी आस्तिकता की पोल खोलते हुए प्रमाणित किया कि प्रत्येक जीव नास्तिक है और बताया
जीव के प्रतिपल आनंद चाहने पर भी अभी तक क्यों नहीं मिला?


जीव के प्रतिपल आनंद चाहने पर भी अभी तक आनंद नहीं मिला क्योंकि उसने गलत दिशा पकड़ ली। जीवात्मा ने अपने आपको भुला दिया कि मैं कौन हूँ? मैं आत्मा हूँ, यह हम भूल गये। हमने अपने आपको देह मान लिया। जब हमने अपने आपको देह माना, तो फिर देह को ही सुख देने का लक्ष्य बना लिया। आनंद इन्द्रियों का विषय नहीं है, वह आत्मा का विषय है। देह को सामान देने से आत्मा को सुख या आनंद नहीं मिलता।
जीव को भगवान का अंश क्यों कहा जाता है?
भगवान का ३ प्रमुख शक्तियाँ हैं- स्वरूप शक्ति, जीव शक्ति, माया शक्ति । जीव भगवान का जीवशक्ति विशिष्ट ब्रह्म श्रीकृष्ण का अंश है। शक्ति होने के कारण उसको अंश कहा जाता है।
जीव को नास्तिक क्यों कहा गया है?
प्रत्येक जीव आनंद चाहता है और आनंद भगवान की पर्यायवाची है। इसलिए प्रत्येक जीव आस्तिक है। अनंत कोटि कल्प तक प्रयत्न करने पर भी कोई आस्तिक नहीं हो सकता। विश्व का प्रत्येक जीव नास्तिक है। भगवान को बिना जाने, सूक्ष्म रूप से अनुभव किए बिना कोई अनजाने में ही किसी को प्यार नहीं कर सकता, भगवान को पुकार नहीं सकता। जब हम भगवान को जानेंगे। तभी मानेंगे न ! तभी प्यार होगा, तभी विश्वास होगा। चूँकि हमने अभी तक भगवान को जाना ही नहीं है, हमारी माया निवृत्ति नहीं हुई हैं इसलिए हम सब नास्तिक हैं।


रामायण कहती है-
जो मोहिं राम लागते मीठे,
सो षटरस नवरस अनरस रस ह्वै जाते सब फीके ।
जो मोहिं राम लागते मीठे ।
जिसको राम मीठे लगेंगे, जिसने राम रस पग लिया, फिर उसको अन्य रस फीका लगेगा। राम रस चखने के पश्चात् फिर अन्य रसों में रुचि हो नहीं सकती। अभी तो हमारी अन्य रसों में रुचि है। अभी राम रस कहाँ अच्छा लगता है ? अब तो संसार का रस अच्छे लगते हैं। भगवान का रस कहाँ अच्छा लगता है ! शवयात्रा के समय ‘राम नाम सत्य हैं’ बोलते हैं, लेकिन वापस आते समय इसको बोलना लोग अशुभ-अमंगल मानते हैं । यह क्या आस्तिकता है! ये तो अक्षरश: सही बात है कि राम का नाम सत्य है। फिर इसको बोलना अमंगलकारी बात कैसे हो गई ? क्या आश्चर्य की बात है! बैकुण्ठ देने वाले तो राम नाम है, फिर उनका नाम अमंगल कैसे हो गया ! यह अपने राम के प्रति हमारी आस्तिकता है!
भगवान का क्या अर्थ है ?
जो षड़ ऐश्वर्यों से युक्त हैं, वे भगवान हैं। उनके पास ८ गुण हैं। अपहतपाप्मा, विजरो, विमृत्यु, विशोक, विजिधत्सो, पिपास:, सत्यकाम:, सत्यसंकल्प:।
हमारी भगवद्‍ बहिर्मुखता
हम भगवान को पुकारते हैं , वह सुनते हैं लेकिन वह जब हमको पुकारते हैं, हम सुन नहीं पाते । भगवान सबको नित्य पुकार रहे हैं लेकिन बहिर्मुखता के करण तथा हमारे अंदर जन्म-जन्मान्तर के पाप की धूल जमा होने के कारण हमें भगवान का आवाहन, भगवान की पुकार, भगवान का दिव्य स्वर सुनाई नहीं देता । हमें तो संसारियों की पुकार सुनाई पड़ती है, ऐसे में हम भगवान की पुकार कैसे सुन सकते हैं?
भगवान भाव के वश में है।
भगवान भाव ही ग्रहण करते हैं। हम जब भोग लगाते हैं, क्या भाव के साथ भोग लगाते हैं? हम तो कोई भाव नहीं बनाते। यह हमारी भगवान के प्रति आस्था है। यह है हमारी आस्तिकता !
भगवान सर्वव्यापक है।
रामायण कहता है-
प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना ।
हम अवश्य बोलते हैं कि भगवान सर्वत्र हैं। पर क्या हम इसे सदा अनुभव भी करते हैं? जब हम गलत काम करते हैं, तो क्या हम सोचते हैं कि भगवान तो सर्वत्र विद्यमान हैं? भगवान तो है यहाँ ! क्या हम यह मानते हैं? इसके विपरीत हम क्या सोचते हैं? हम जो गलती कर रहे हैं, कोई नहीं जान पाएगा। यहाँ तो कोई नहीं है।
भगवान से प्रेम कब होगा ?
भगवान को जानेंगे, मानेंगे तब विश्वास होगा। विश्वास होने से प्रेम होगा। विश्वास की उत्पत्ति के लिए भगवान को जानना ही पड़ेगा। लेकिन वेद कहता है कि कोई भी उसको नहीं जान सकता। फिर वेद ही कहता है- तमेव विदित्वाति मृत्युमेति…। अर्थात् जल्दी इसी मनुष्य शरीर में भगवान को जान लो, मानव देह छिन जाएगा तो पछताओगे। संसार में सामान एकत्रित करने में जो चार-सो-बीसी करता है, उसको दंड मिलता है, ऐसे ही ईश्वरीय क्षेत्र में भी होता है। इस विषय में हम कभी नहीं सोचते। आध्यात्मिक क्षेत्र में भी केवल क्रिया करेंगे और आत्मा के लिए कमाई नहीं करेंगे तो दंड मिलेगा, जैसे संसार में भगवान का कितना स्मरण किया है, हमने कितना विह्वल होकर उनको पुकारा है, उनसे कितना प्यार किया है, बस यही हमारी कमाई है ? यही हमारे साथ जाएगा। तो भगवान को इसी शरीर में जानना है
लेकिन वेद कहता है कि कोई भगवान को नहीं जान सकता।
भगवान को हम अपनी बुद्धि से नहीं जान सकते। इसका कारण वेद कहता है-
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् ।
(माण्डूक्योपनिषद् ७वाँ मंत्र)
अर्थात् भगवान या ईश्वर सर्वथा अदृष्ट, अव्यवहार्य, अलक्षण, अव्यपदेश्य, अचिन्त्य है। उसको कोई नहीं जान सकता। यदि हम वो हम अवश्य जान सकते हैं। अब प्रश्न है कि उनको कैसे जानेंगे ?

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