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भगवान विष्णु के हयग्रीव की अवतार की कथा वेदों की रक्षा और ज्ञान की पुनर्स्थापना से जुड़ी ज्ञान की कथा ब्यास पीठ पर विराजमान पंडित जी डॉक्टर श्री प्रेम नारायण शर्मा जी

जांजगीर चांपा जिले के बलौदा ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत कोसमंदा गांव में बस स्टैंड स्थित राठौर परिवार के सान्निध्य में श्री मद देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन हो रहा है जिसमें ब्यास पीठ पर विराजमान है पण्डित श्री प्रेमनारायण शर्मा जी देवकर बेमेतरा वाले जो अपने मुखारबिंद से भागवत प्रेमी सज्जनों को कथा का रसपान करा रहे है और श्रोता बंधु एकाग्रचित होकर कथा का रसपान कर रहे है
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन परमब्रह्म अनंतकोटी ,ब्रह्माण्ड नायक ,करुणा वरुणालय , आनन्दकन्द ,देवकी नंदन , रास रासेश्वर श्री कृष्ण जी और राधारानी और मां भगवती जी की असीम कृपा एवं पितरों की दिव्य आशीर्वाद से हम सभी को मां भगवती की श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञान का पण्डित श्री प्रेमनारायण शर्मा जी के मुखरबृंद से कथा का रसपान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है
पण्डित श्री प्रेमनारायण शर्मा जी अपने मुखारबिंद से भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ में कथा का रसपान भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार की कथा वेदों की रक्षा और ज्ञान की पुनर्स्थापना से जुड़ी कथा का रसपान कराए एवं मधु-कैटभ नामक राक्षसों ने ब्रह्मा जी से वेद चुरा लिए थे, जिन्हें वापस पाने के लिए विष्णु जी ने घोड़े के मुख (हय = घोड़ा, ग्रीव = गर्दन) वाले इस विशेष रूप में अवतार लिया। उन्होंने हयग्रीव नामक राक्षस का वध किया जो उसी रूप में था, और वेदों को पुनः प्राप्त किया।
हयग्रीव अवतार की प्रमुख कथा:
वेदों का हरण: पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में मधु और कैटभ नामक दो राक्षसों ने ब्रह्मा जी से वेद चुरा लिए थे, जिससे संसार में अज्ञानता फैल गई।
अवतार का कारण: ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर, भगवान विष्णु ने घोड़े के सिर और मनुष्य के शरीर वाले हयग्रीव रूप में अवतार लिया।
हयग्रीव नाम का राक्षस: एक कथा के अनुसार, हयग्रीव नाम के ही एक राक्षस ने यह वरदान पाया था कि उसे केवल एक हयग्रीव (घोड़े के सिर वाला) ही मार सकता है, इसलिए विष्णु जी ने यह रूप धारण किया।
युद्ध और वेदों की वापसी: हयग्रीव रूप में भगवान विष्णु ने राक्षस का वध किया और वेदों को पुनः प्राप्त कर ब्रह्मा जी को सौंपा।

अन्य कथा (लक्ष्मी जी का श्राप):
एक अन्य कथा के अनुसार, माता लक्ष्मी के श्राप के कारण भगवान विष्णु का सिर धड़ से अलग हो गया था। तब देवताओं ने भगवान विष्णु के धड़ पर घोड़े का सिर लगाया, जिससे वे हयग्रीव कहलाए।

हयग्रीव को बुद्धि, ज्ञान और विद्या का देवता माना जाता है।
भगवान विष्णु प्रमुख रूप से 24 अवतारों हैं। इन 24 अवतारों में से ही एक अवतार है हयग्रीव। संभवत: ये 16वें नंबर के अवतार है l
इस अवतार के संबंध में दो कथाएं मिलती है पहली यह कि एक बार मधु और कैटभ नाम के दो शक्तिशाली राक्षस ब्रह्माजी से वेदों का हरण कर रसातल में पहुंच गए। वेदों का हरण हो जाने से ब्रह्माजी बहुत दु:खी हुए और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। तब भगवान ने हयग्रीव अवतार लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु की गर्दन और मुख घोड़े के समान थी। तब भगवान हयग्रीव रसातल में पहुंचे और मधु-कैटभ का वध कर वेद पुन: भगवान ब्रह्मा को दे दिए।

दूसर कथा यह कि एक समय की बात है क‌ि एक बार भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी के सुंदर रूप को देखकर मुस्कुराने लगे। देवी लक्ष्मी को लगा कि वे हंसी उड़ा रहे हैं तो बिना सोचे समझे उन्होंने शाप दे दिया कि आपका सिर धड़ से अलग हो जाए।

इसमें भी प्रभु की माया थी। फिर एक बार विष्णुजी युद्ध करते हुए थक गए तो उन्होंने अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे धरती पर टिकाया और बाण की नोक पर अपना सिर रखकर योग निंद्रा में सो गए।

फिर हुआ यह कि दूसरी ओर हयग्रीव नाम का एक असुर महामाया का भयंकर तप कर रहा था। भगवती ने उसे तामसी शक्ति के रूप में दर्शन दिया और कहा कि वर मांगो। उसने अमरदा का वरदान मांगा तो माता ने कहा कि संसार में जिसका जन्म हुआ उसे तो मरना ही होगा। यह तो विधि का विधान है। तुम कोई दूसरा वर मांगो। तब उसने कहा कि अच्छा तो मेरी अभिलाषा यह है कि मेरी मृत्यु हयग्रीव के हाथों हो। माता ने कहा कि ऐसा ही होगा। यह कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गईं। हयग्रीव को लगा की अब मेरी मृत्यु तो मेरे ही हाथों होगी, अत: मैं अजर अमर हो गया, परंतु वह कुछ समझ नहीं पाया था।

फिर हयग्रीव ने ब्रह्माजी से वेदों को छीन लिया और देवताओं तथा मुनियों को सताने लगा। यज्ञादि कर्म बंद हो गए और सभी त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगे। यह देखकर सभी देवता ब्रह्मादि सहित भगवान विष्णु के पास गए परंतु वे योगनिद्रा में निमग्र थे और उनके धनुष की प्रत्यंचा चढ़ी हुई थी। ब्रह्माजी ने उनको जगाने के लिए वम्री नामक एक कीड़ा उत्पन्न किया, जिसने वह प्रत्यंचा काट दी। इससे भयंकर टंकार हुआ और भगवान विष्णु का मस्तक कटकर अदृश्य हो गया। यह देखकर सभी देवता दु:खी हो गए और उन्होंने इस संकट के काल में माता भगवती महामाया की स्तुति की। भगवती प्रकट हुई अर उन्होंने कहा कि चिंता मत करो। ब्रह्माजी एक घोड़े का मस्तक काटकर भगवान के धड़ से जोड़ दें। इससे भगवान का हयग्रीवावतार होगा। वे उसी रूप में दुष्ट हयग्रीव दैत्य का वध करेंगे। ऐसा कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गई।

भगवती के कथनानुसार उसी क्षण ब्रह्मा जी ने एक घोड़े का मस्तक उतारकर भगवान के धड़ से जोड़ दिया। भगवती की माया से उसी क्षण भगवान विष्णु का हयग्रीवावतार हो गया। फिर भगवान विष्णु अपने इसी अवतार में हयग्रीव नामक दैत्य से युद्ध करने पहुंच गए। अंत में भगवान के हाथों हयग्रीव की मृत्यु हुई। हयग्रीव को मारकर भगवान ने वेदों को ब्रह्माजी को पुन: समर्पित कर दिया और देवताओं तथा मुनियों को संकट से मुक्ति मिली।

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