राम को चाहो, राम से नहीं—इसी भाव में छिपा है भक्ति का रहस्य : श्री अनिरुद्धाचार्य महाराज




माता सीता के प्रसंग से समझाया इच्छा और समर्पण का अंतर, लक्ष्मण रेखा, भक्तों के सम्मान और अहंकार त्याग का दिया संदेश


जांजगीर-चांपा जिले के बम्हनीडीह में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा पुराण में व्यास पीठ पर विराजमान श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने अपने मुखारविंद से श्रद्धालुओं को अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक भगवान श्री बांके बिहारी जी की अमृतमयी कथा का रसपान कराया। कथा के दौरान उन्होंने धार्मिक प्रसंगों के माध्यम से जीवन में मर्यादा, भक्ति, संयम, सेवा और अहंकार त्याग का संदेश देते हुए पापों से बचने का मार्ग भी बताया।
श्री अनिरुद्धाचार्य महाराज ने ‘श्रीराम को चाहना’ और ‘श्रीराम से चाहना’ के बीच का अंतर समझाते हुए कहा कि भक्ति में भगवान को पाने की भावना होनी चाहिए, न कि भगवान से अपनी इच्छाओं की पूर्ति की अपेक्षा। उन्होंने माता सीता के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वर्ण मृग के प्रति आकर्षण के कारण भगवान श्रीराम से उसे लाने की इच्छा व्यक्त हुई और इसी प्रसंग के बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि माता सीता को भगवान श्रीराम से वियोग सहना पड़ा।
भक्त का अपमान भगवान को भी स्वीकार नहीं
महाराज ने लक्ष्मण और माता सीता के प्रसंग से सीख देते हुए कहा कि भगवान अपना अपमान सह सकते हैं, लेकिन अपने भक्त का अपमान सहन नहीं करते। उन्होंने कहा कि हमें अपने शब्दों और व्यवहार पर संयम रखना चाहिए, क्योंकि कटु वचन कभी-कभी रिश्तों में ऐसी दूरी पैदा कर देते हैं, जिसकी भरपाई कठिन हो जाती है।
उन्होंने लक्ष्मण रेखा के प्रसंग को मर्यादा और सीमाओं का प्रतीक बताते हुए कहा कि मनुष्य को अपनी मर्यादा की सीमा नहीं लांघनी चाहिए। रावण साधु का वेश धारण कर भिक्षा मांगने आया और इसी छल के माध्यम से माता सीता का हरण कर लिया। यह प्रसंग हमें सावधान करता है कि हर परिस्थिति में विवेक और मर्यादा का पालन आवश्यक है।
अपने से जीतने के बजाय अपनों से हारना सीखें
कथा में माता पार्वती और भगवान शिव के प्रसंग का उल्लेख करते हुए श्री अनिरुद्धाचार्य महाराज ने कहा कि अपने माता-पिता और परिवार के लोगों से जीतने की जिद नहीं करनी चाहिए। उन्होंने संदेश दिया कि अपनों से हार जाना भी कई बार सबसे बड़ी जीत होती है। माता-पिता और भाइयों के साथ अहंकार या जिद के बजाय प्रेम, सम्मान और समर्पण का भाव रखना चाहिए।
उन्होंने बिना निमंत्रण के किसी के घर जाने के प्रसंग से भी सीख लेने की बात कही और बताया कि धार्मिक कथाओं के प्रत्येक प्रसंग में मनुष्य के व्यवहार और जीवन के लिए गहरी सीख छिपी हुई है।
जहां-जहां माता का अंग गिरा, वहां बने शक्तिपीठ
महाराज ने माता सती के प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि माता के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। उन्होंने इस प्रसंग के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, शक्ति और त्याग के महत्व को समझाया।
भोलेनाथ के मंदिर में चढ़ती राख देती है अहंकार त्याग की सीख
भगवान शिव के स्वरूप की व्याख्या करते हुए श्री अनिरुद्धाचार्य महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपने रूप, धन, पद और संपत्ति पर घमंड नहीं करना चाहिए। एक दिन यही शरीर मिट्टी में मिल जाना है।
उन्होंने कहा कि भगवान भोलेनाथ को चढ़ाई जाने वाली भस्म हमें जीवन की अंतिम सच्चाई का स्मरण कराती है। भस्म यह संदेश देती है कि संसार में सब कुछ नश्वर है, इसलिए अहंकार करने के बजाय सेवा, सदाचार और परोपकार का मार्ग अपनाना चाहिए।
उन्होंने भगवान शिव के गले में विराजमान सर्प का भी आध्यात्मिक महत्व बताते हुए कहा कि भगवान शिव का स्वरूप स्वयं यह संदेश देता है कि जो व्यक्ति भय, अहंकार और मोह से ऊपर उठकर भगवान की शरण में जाता है, उसके जीवन में भक्ति और वैराग्य का प्रकाश आता है।
कथा के दौरान महाराज के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालु भगवान की कथा में डूबे रहे और भक्ति, मर्यादा, सेवा तथा अहंकार त्याग के संदेश को आत्मसात करने का संकल्प लेते नजर आए।