ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित हनुमान मंदिर चौपाटी में चल रहे 21 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला का चौथा दिन भगवान सर्वज्ञ है और जीव अल्पज्ञ है परम पूज्य स्वामी श्री युगल शरण जी



ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित हनुमान मंदिर चौपाटी में चल रहे 21 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला का चौथा दिन रहा पूज्य स्वामी श्री युगल शरण जी के स्वागतार्थ पुष्प गुच्छ अर्पित किया। तत्पश्चात स्वामी जी अपने चिरपरिचित शैली में ब्रह्म का स्वरूप विषय पर प्रकाश डाला और उन्होंने बताया
१. हम भगवान को क्यों नहीं जान सकते?
भगवान को नहीं जान सकते। वेद में इस विषय में कहा गया है-
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ।।
(कठोपनिषद्, १-३-१० )
हमारे पास जो इन्द्रियाँ हैं, उससे परे इन्द्रियों के विषय, उससे परे मन, उससे परे बुद्धि, बुद्धि से परे: आत्मा, आत्मासे परे माया और माया से परे भगवान हैं। परे अर्थात् जहाँ तक पहुँचा नहीं जा सके। इसलिए मन, बुद्धि, इन्द्रिय कैसे भगवान तक पहुँच सकता है ?
२. इन्द्रिय, मन, बुद्धि से भगवान अग्राह्य
हमारे इन्द्रिय, मन, बुद्धि प्राकृत हैं, शरीर पंचमहाभूत का बना हुआ है, परंतु भगवान दिव्य हैं। दिव्य को प्राकृत जान नहीं सकता इसलिए प्राकृत बुद्धि से दिव्य को नहीं जाना जा सकता। मन, बुद्धि, इन्द्रिय प्राकृत होने के कारण दिव्य भगवान को ग्रहण नहीं कर सकता। वेदव्यास ने भगवान को जानने के विषय में कहते हैं- न मैं जान सकता हूँ न तुम जान सकते हो, न देवता, असुर आदि, यहाँ तक कि ब्रह्मा भी भगवान को नहीं जान सकते। वह इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि से परे हैं। तुलसीदास भी कह रहे हैं-
जग पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।
(रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड – दोहा १२६, चौपाई – १ )
भगवान को विधि, हरि, शंभु भी नहीं जान सकते।
३. जीव और भगवान में अंतर
क) भगवान दिव्य है, जीव प्राकृत है।
जीव का शरीर पंचमहाभूत से बना है और षड् विकारों से युक्त है। भगवान का शरीर पंचमहाभूतों और सब विकारों से रहित है।
क) भगवान प्रेरक है, जीव प्रेर्य है। जो प्रेरक की प्रेरणा से इन्द्रिय, मन, बुद्धि अपना-अपना कार्य करने में समर्थ होते हैं।
ख) भगवान प्रकाशक है, जीव प्रकाश्यमान है। भगवान प्रकाश दे रहे हैं, तब हम प्रकाशित हो रहे हैं। जिसके प्रकाश से हम प्रकाशित हो रहे हैं, उसका प्रकाशक हम कैसे बन सकते हैं ?
ग) भगवान ज्ञाता है, जीव ज्ञेय है।
ज्ञाता माने जो सब को जानता है। ज्ञेय को सीमित जानकारी है। इसलिए उस ज्ञाता को ज्ञेय अपनी सीमित बुद्धि से कैसे जान सकता है ?
) भगवान सर्वज्ञ है और जीव अल्पज्ञ है ।
जो अनंत ब्रह्मांड के ,प्रत्येक ब्रह्मांड के , प्रत्येक लोक के , प्रत्येक देश के , प्रत्येक प्रान्त के, प्रत्येक शहर के ,प्रत्येक नगर के , प्रत्येक ग्राम के, प्रत्येक पोखरे में रहने वाले अनन्तानन्त जीवों के प्रतिक्षण के विचारों को नोट करते हैं , वे सर्वज्ञ होते हैं । ऐसे सर्वज्ञ के पास अल्पज्ञ जीवों की बुद्धि कैसे पहुँचेगी ?
४. भगवान अनंत विरोधी धर्म का अधिष्ठान
क) श्रीकृष्ण अखंड ब्रह्मचारी भी है और गोपियों के पीछे-पीछे भागते हैं।
ख) भगवान को अणोरणीयान् अर्थात् छोटी से छोटी वस्तु में व्याप्त होना है, इसलिए भगवान छोटे से छोटा है, महाप्रलय के समय सबको अपने महोदर में प्रविष्ट कराना है, इसलिए भगवान महतो महीयान्, बड़े से बड़ा है।
ग) भगवान इन्द्रियों से रहित है, लेकिन समस्त इन्द्रियों का कार्य करते है। पैर नहीं है पर चलता है, आँख नहीं है पर देखता है, कान नहीं है पर सुनता है।
घ) भगवान धर्म-अधर्म से परे हैं।
ङ) भगवान अज है अर्थात् जिसका कभी जन्म नहीं हुआ है, लेकिन बार बार अवतार लेकर धराधाम में आते हैं।
च) भगवान साकार भी है, निराकार भी है। उनकी किसी से मित्रता नहीं है और न ही शत्रुता है।
छ) भगवान परम स्वतंत्र हैं, लेकिन भक्तों के आधीन हैं।
ज) भगवान न्यायकर्ता है, लेकिन भक्तों के लिए कृपाकर्ता भी बन जाते हैं।
५.. सनातन तीन तत्व
सनातन तीन तत्त्व है- जीव, माया, ब्रह्म जीव अज है. माया अजा है और ब्रह्म अज है। इन तीनों में किसी ने किसी को नहीं बनाया है और न ही कोई किसी को नष्ट ही कर सकता है। ये सनातन तत्त्व हैं, नित्य तत्त्व हैं।
निष्कर्ष-
तो ऐसे विरोधी धर्म के अधिष्ठान हैं भगवान ऐसे विरोधी धर्म के अधिष्ठान भगवान को बुद्धि द्वारा समझा नहीं जा सकता।,हाँ, यह सही है कि भगवान को हम अपनी बुद्धि से नहीं जान सकते, लेकिन उपाय है, जिससे भगवान को जाना जा सकता है।


