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ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के 15वें दिन पूज्य स्वामी युगल शरण जी ने ज्ञान मार्ग के विषय में विस्तृत व्याख्या की और बताया

ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के 15वें दिन पूज्य स्वामी युगल शरण जी ने ज्ञान मार्ग के विषय में विस्तृत व्याख्या की और बताया कि अनंत कोटि जीवों में से मनुष्य ही केवल भगवत् प्राप्ति कर सकता है। क्योंकि मनुष्य का कुछ विशेषता है जिसके कारण वह भगवत्प्राप्ति कर सकता है। स्वामी जी का जन्म ओडिशा के एक वैष्णव परिवार में हुआ, बचपन से ही साधु संग उन्होंने पाया और भारत सरकार के अधीन एक वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में भी उन्होंने सेवा दी


- मनुष्य ज्ञान प्रधान है और कर्म प्रधान भी है। मनुष्य को भगवान ने जो ज्ञान दिया है, उसका सदुपयोग करके उनको प्राप्त करना है। कबीर जी ने कहा- ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः अर्थात् ज्ञान के द्वारा ही मुक्ति सम्भव। गीता में श्रीकृष्ण कह रहे हैं- उदाराः सर्व एवैते ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम्।
अर्थात् ये सब उदारचेता व्यक्ति है, किन्तु जो मेरे ज्ञान को प्राप्त है, उसे मैं अपने ही समान मानता हूँ, वो मेरी आत्मा है।
2.’जन्मान्तर सहस्रेषु’ अर्थात् करोड़ों वर्षों में कोई एक ज्ञानी बनता है।
ज्ञान मार्ग बहुत ही कठिन मार्ग है। एक ओर ज्ञान की प्रशंसा और दूसरी ओर वेद कहता है- कर्म मार्ग से जाने वाले तो नासमझ है ही। लेकिन ज्ञान मार्ग से जो जाते हैं, वह तो महामूर्ख है। यहाँ ज्ञान की निंदा। तो आज तक समझ नहीं पाये कि कौन सा ज्ञान वंदनीय और कौन सा ज्ञान निंदनीय है? किसको अपनाना है और किसको त्यागना है- ये समझना बहुत आवश्यक है।
3.तुलसीदास रामायण में कह रहे हैं- पहले ज्ञानियों की प्रशंसा की, उसके पश्चात् निंदा कर रहे हैं। पहले कहते हैं-“ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा” अर्थात् ज्ञानी भगवान के सर्वाधिक प्रिय है। फिर कहते हैं तुलसीदास – “भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा” अर्थात् भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं। लेकिन अब गाली देते हैं- कहते हैं कि वह मूर्ख ही, नहीं महामूर्ख। फिर कहते हैं- ज्ञानी बड़ा विचित्र प्रकार के जानवर है जिसके न सींग है ना पूँछ।
4.ज्ञान दो प्रकार की है- एक संसारी जगत का ज्ञान और दूसरा ईश्वरीय जगत का ज्ञान। अर्थात् एक शाब्दिक ज्ञान और एक अनुभवात्मक ज्ञान | शास्त्र-वेद कण्ठस्थ कर लिए, शास्त्र का ज्ञान है, इसको शाब्दिक ज्ञान कहते हैं, यदि किसी के पास शाब्दिक ज्ञान प्रचुर मात्रा में हैं, लेकिन कभी इसका प्रैक्टिकल अनुभव नहीं किया। भगवान का कोई प्रैक्टिकल रिलाइजेसन नहीं है। ऐसा थोथा ज्ञान किस काम की! शाब्दिक ज्ञानी शब्दों का बढ़िया माधुर्य रखता है, लेकिन हृदय भावहीन है। इसलिए केवल शाब्दिक ज्ञानी नींदनीय है। उसके अंदर एक बीमारी पैदा हो जाता है- मिथ्या अहंकार, मिथ्या अभिमान, मैं बहुत जानता हूँ। वह एक साधारण जीव से भी नीचे हो जाता है। क्योंकि ये मिथ्या अभिमान भगवान से पृथक् करने वाला महान् बाधक तत्त्व है। अनुभवात्मक ज्ञानी बनना चाहिए। ये अनुभवात्मक ज्ञानी दो प्रकार की होते हैं। एक होता है आत्मज्ञानी और दूसरा परमात्म ज्ञानी ।
5.आत्मज्ञानी और परमात्म ज्ञानी के विषय में बताया आत्मज्ञानी अभी पूर्ण ज्ञानी बना नहीं और परमात्म ज्ञानी जो पूर्ण ज्ञानी है।
6.शास्त्र कहता है जो घोर विरक्त है, वह ज्ञान मार्ग का अवलंब ले सकता है। ज्ञान मार्ग की प्रवेशिका बड़ी क्लिष्ट है। आदि जगद्गुरु शंकराचार्य वेदान्त में प्रथम सूत्र का भाष्य कर रहे थे “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” अर्थात् अब ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा हुई। इसका मतलब अब से पहले बहुत कुछ करना पड़ा। अब की स्थिति में आने के लिए बहुत कुछ करना है। इसलिए शंकराचार्य कह रहे हैं कि अब ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा हुई। ज्ञान मार्ग में ८ कक्षायें है। जो साधन चतुष्टय संपन्न है, वह ज्ञान मार्ग में प्रवेश कर सकता है। विवेक, वैराग्य, शमादिगुणशालिनता, मुमुक्षुत्व। ये है अन्तरंग साधन । इसको साधन चतुष्टय कहते हैं। शमादिगुणशालिनता या षट् संपत्ति- शम, दम, तितिक्षा, उपरति श्रद्धा, समाधान । मुमुक्षुत्व के बाद श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि ये है बहिरंग साधन ।
7.८ कक्षायें का अर्थ
विवेक – नित्य-अनित्य वस्तु का ज्ञान, वैराग्य- किसी से ना प्यार हो ना किसी से खार हो, शमादिगुणशलिनता – (शम का अर्थ मन पर कण्ट्रोल, दम-इन्द्रियों पर कण्ट्रोल, उपरति संसार से वैराग्य, तितिक्षा – सहनशीलता, श्रद्धा-गुरु के वाक्य पर दृढ़ निष्ठा, अटल विश्वास, समाधान – एकाग्रता), मुमुक्षुत्व-व्याकुलता, श्रवण – वास्तविक संत से ज्ञान का श्रवण, मनन- बारम्बार चिन्तन, निदिध्यासन- निष्पत्ति ( अहं ब्रह्मास्मि), समाधि-ध्यान का गहरा अवस्था ।
8.निदिध्यासन के बाद समाधि होता है।
अहं ब्रह्मास्मि के बाद शून्य। निर्विकल्प समाधि। पंचतत्त्व (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश) सबको लाँघ जाता है वह ज्ञानी ।