Uncategorized

दुनिया से ‘अच्छा कहलाने’ के बजाय, ‘अच्छा बनने’ का प्रयास करें” — रासेश्वरी देवी जी ने समझाया संसार का स्वरूप

उपनिषद ज्ञानामृत आठवां दिवस दिनांक 2अक्टूबर 26 को ज्ञानमृत कथा प्रवचन का बताया कि दुनिया से ‘अच्छा कहलाने’ के बजाय, ‘अच्छा बनने’ का प्रयास करें” — रासेश्वरी देवी जी ने समझाया संसार का स्वरूप

जांजगीर: हाई स्कूल ग्राउंड, जांजगीर में आयोजित ‘उपनिषद ज्ञानामृत’ दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के आठवें दिन जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका, पूजनीया रासेश्वरी देवी जी ने भगवान के अस्तित्व के प्रमाण, सनातन धर्म की व्यापकता, संसार क स्वरूप और पूर्ण शरणागति जैसे विषयों पर वेद- उपनिषदों पर आधारित आध्यात्मिक तत्वज्ञान और तर्कों का प्रयोग करते हुए प्रकाश डाला

सनातन धर्म और भगवान के अस्तित्व का प्रमाण: प्रवचन का आरंभ करते हुए देवी जी ने एक बहुत बड़ी भ्रांति को दूर किया कि ‘सनातन धर्म’ कोई ‘रिलिजन’ नहीं है। रिलिजन किसी व्यक्ति (संस्थापक) द्वारा शुरू किया जाता है, जबकि सनातन वैदिक धर्म भगवान द्वारा ब्रह्मांड के आरंभ में प्रकट किया गया एक ‘सार्वभौमिक नियम है, जो सभी पर लागू होता है।

उन्होंने भगवान के अस्तित्व को सिद्ध करने वाले तीन प्रमाण बताए— प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। प्रत्यक्ष प्रमाण बहुत सीमित है; जैसे दूध में मक्खन मौजूद होने पर भी बिना मथे नहीं दिखता, वैसे ही अंतःकरण की शुद्धि रूपी प्रक्रिया के बिना भगवान प्रत्यक्ष नहीं होते। अनुमान प्रमाण के अनुसार, जिस तरह बिना कुम्हार और मिट्टी के घड़ा नहीं बन सकता, उसी तरह इतने सुव्यवस्थित ब्रह्मांड और ग्रहों का भी कोई न कोई रचयिता अवश्य है। अंततः आध्यात्मिक ज्ञान के लिए ‘शब्द प्रमाण’ (वेद-शास्त्र) ही सर्वोच्च और अकाट्य है। उन्होंने कहा कि हम अपने से अधिक ज्ञान वाले के ज्ञान और अनुभव को मान्यता देते हैं| वेद-उपनिषद् तो स्वयं भगवान की वाणी हैं| उन्हें प्रमाण मानकर हम भगवान को मानते हैं|

सच्ची शरणागति का स्वरूप: भगवान को अपनी सीमित बुद्धि से नहीं, बल्कि शरणागति से ही पाया जा सकता है। देवी जी ने द्रौपदी के चीरहरण का प्रसंग देते हुए बताया था कि जब तक द्रौपदी ने गुरुजनों, पतियों या स्वयं के शारीरिक बल का सहारा लिया, भगवान नहीं आए। लेकिन जैसे ही वह पूर्णतः निराधार होकर भगवान के प्रति समर्पित हुई, श्री कृष्ण ने तुरंत उसकी रक्षा की।

उन्होंने समझाया कि सच्ची शरणागति का अर्थ है— अपनी सीमित ‘अक्ल’ को किनारे रखकर अपने मन और बुद्धि को गुरु व भगवान के निर्देशों पर छोड़ देना। ठीक वैसे ही जैसे एक मरीज बिना तर्क किए डॉक्टर की दवा खाता है, या एक विद्यार्थी बिना तर्क किए शिक्षक द्वारा बताए गए ज्ञान को स्वीकार कर लेता है। शरणागति का अर्थ है मन और बुद्धि को भगवान को सौंप देना| अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों ही स्थितियों में भगवान के प्रति प्रेम बना रहे और यह दृढ़ विश्वास कि भगवान हमारी रक्षा अवश्य करेंगे| यही शरणागति का स्वरूप है|

बाहर और भीतर का संसार: हम इस भ्रम में हैं कि संसार में सुख अवश्य मिलेगा| संसार का स्वरूप समझे बिना हम शरणागति की ओर नहीं बढ़ सकते| देवी जी ने संसार के दो प्रकार बताए। पहला, भगवान द्वारा रचित ‘बाहर का संसार’, जो शरीर के लिए आवश्यक है। दूसरा, हमारे मन द्वारा रचित ‘भीतर का संसार’, जो मिथ्या और भयंकर है। इस दृष्टि से दो वाद प्रचलित हैं – भौतिकवाद और अध्यात्मवाद| शरीर को स्वस्थ रखने के लिए भौतिकवाद जरूरी है, लेकिन मन को पवित्र रखने के लिए आध्यात्मवाद अत्यंत अनिवार्य है। भौतिवाद की उन्नति से बुद्धि विक्षिप्त और विकृत होती जा रही है जो मानसिक रोग और अशान्ति को जन्म दे रही है| देवी जी इस बात पर जोर देते हुए कहा कि हम सिर्फ़ शरीर नही हैं, आत्मा हैं| आत्मा को ठीक रखने के लिए अध्यात्मवाद परमावश्यक है|

दोनों वादों के अद्वितीय समन्वयवकर्ता के रूप में देवी जी ने अपने गुरुदेव पंचम मौलिक जगद्गुरु स्वामि श्री कृपालु जी महाराज के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला और उन्होंने बताया कि वे रामकृष्णदेव और चैतन्य महाप्रभु की तरह अवतारी पुरुष हैं| अपने गुरुवर के सिद्धांत को आधार मानते हुए बताया कि सुख शांति पाने के लिए भीतरवाले संसार पर काम करना है; इसे पवित्र करना है| भीतरवाला संसार ही सारी गड़बड़ियों का कारण है| देवी जी ने कहा, “ मन पवित्र अध्यात्मवाद से होगा, इसे स्वर्ण अक्षरों में लिख लीजिए|”

उन्होंने बताया कि इस संसार में सभी मनुष्यों के भीतर सत्व, रज और तम गुण अलग-अलग मात्रा में होते हैं, इसलिए कोई भी व्यक्ति पूरी तरह किसी के अनुकूल नहीं हो सकता। जब गुणों में समानता होती है तो लगाव और असमानता होने से तकरार होती है| इस सिद्धांत को समझ लेने से शान्ति का मार्ग अपनाया जा सकता है| अतः दुनिया से अच्छा कहलाने की व्यर्थ चाह छोड़कर, अपने भीतर के जगत पर काम करना है| प्रवचन के अंत में देवी जी ने कहा कि अच्छा कहलाने के चक्कर में मत पड़िए, अच्छा बनिए|

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *