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ब्रज गोपिका सेवा मिशन के तत्वाधान में चल रहे प्रवचन के 8वे दिन पूज्य स्वामी युगल शरण जी ने जानकारी दी और कहा कि संसार का रहस्य क्या है और संसार किसे कहते है और कितने प्रकार है

जन्मेजय महोबे जी जांजगीर चांपा जिले के कलेक्टर
नारायण चंदेल जी

चांपा में चल रहे ब्रज गोपिका सेवा मिशन के तत्वाधान में चल रहे 8.12.25 को  प्रवचन के 8वे दिन पूज्य स्वामी जी ने जानकारी दी कल प्रातः 7.00 बजे से 8.30 तक रुपध्यान साधना और मेडिटेशन और भजन कीर्तन होगा जिसमें सभी नगर वासी आमंत्रित हैं। फिर अपने शैली में प्रवचन प्रारंभ करते हुए संसार के स्वरूप की विस्तृत व्याख्या की और बताया कि

नारायण चंदेल एवं जन्मेजय महोबे जांजगीर चांपा कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक विजय कुमार पाण्डेय
यदुमनी सिदार  एस डी ओ पी चांपा एवं रामखिलावन यादव संपादक जनादेश 24न्यूज एवं शशि भूषण सोनी


संसार किसको कहते हैं और संसार कितने प्रकार?
संसरतीति संसार, गच्छतीति जगत् अर्थात् नित्य गतिशील का नाम ही संसार, सरकने वाले का नाम जगत्। संसार दो प्रकार। एक स्थूल संसार और एक सूक्ष्म संसार।
जगत में दो प्रकार की वाद प्रचलित और इसका आवश्यकता
दो प्रकार की वाद-एक भौतिक वाद और दूसरा अध्यात्म वाद। हम लोगों के लिए दोनों का आवश्यकता है। क्योंकि हम दो है। शरीर और आत्मा। शरीर के लिए भौतिक वाद और आत्मा के लिए अध्यात्म वाद। संसार में भौतिकवादी अध्यात्मवादी को मानना नहीं चाहते। भौतिकवादी अपने आपको शरीर मानते हैं, आत्मा तो मानते ही नहीं।


अध्यात्मवाद को नहीं मानने से क्या हो रहा है।
अध्यात्मवाद को नहीं मानने के कारण हमारे देश में मनोरोगी, मनोवैज्ञानिक रोगी और नैराश्य आदि ज्यादा दिखाई पड़ता है। यह कभी नहीं था, बहुत कम था। पहले हम अध्यात्मवादी थे, लेकिन आज भौतिकवादी होने के कारण यह सारी विमारियाँ हो रही है।
हमें दोनों वाद को लेकर चलना है।
शरीर को ठीक रखने के लिए भौतिक वाद और आत्मा को ठीक रखने के लिए अध्यात्म वाद की आवश्यकता है।
जगद्‌गुरु शंकराचार्य ने संसार के बारे में क्या कहा?
जगद्‌गुरु श्री शंकराचार्य ने कहा- संसार मिथ्या है। मनः कल्पित है। मन की कल्पना है।
और तीन जगद्‌गुरु संसार के बारे में क्या कहते हैं?
जगद्‌गुरु रामानुजाचार्य जो बलराम के अवतार हैं, जगद्‌गुरु निम्बाकाचार्य जो सुदर्शन चक्र के अवतार है और जगद्‌गुरु माध्वाचार्य हनुमान जी के अवतार हैं- सब ने कहा कि संसार सत्य है।
जगद्‌गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज का संसार के बारे में क्या मत है?
जगद्‌गुरु श्री शंकराचार्य का सिद्धान्त था संसार मिथ्या है और वाकी तीन जगद्‌गुरुओं का सिद्धान्त था- संसार सत्य है। श्री कृपालु जी महाराज ने दोनों सिद्धान्त को माना अर्थात् संसार सत्य भी है, मिथ्या भी है। दोनों वातें कैसे सही हो सकती, कोई एक वात सही होगा न ? स्थूल संसार या बाहर का संसार जो भगवान ने बनाया है- पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, ये सत्य है। सूक्ष्म संसार या भीतर का संसार हमारा मन बनाता है, इसलिये ये मिथ्या है।
8.हम जो असीमित सुख चाहते हैं, वह क्या संसार में हमको मिलता है?
संसार में जो सुख हमको मिलता वह सीमित सुख। ये सुख शरीर की पाँच इन्द्रियों से मिलता है, वह है शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध। हम ये पाँच इन्द्रियों का सामान देते रहते हैं।
भीतर वाला संसार बाहर वाला संसार को पाकर बढ़ जाता है।
जब हम किसी के बारे में चिन्तन करते है, वह हमारे भीतर रहता है। यदि हम उसके विषय में सोचते हैं और देख लेते हैं तो भीतर का संसार और बढ़ जाता है।
बाहर वाला संसार नहीं है, तो इसका ये अर्थ नहीं है कि उसको कोई दुःख नहीं होगी।*
बाहर वाला संसार नहीं होने पर भी संसार समाप्त नहीं होता है। अभी उनका किसी के साथ संबंध नहीं है, लेकिन पहले था। अब उनका कोई अशांति नहीं। तो उसको तो आनंद मिल जाएगा। नहीं। उसका बाहर वाला संसार समाप्त होने से क्या हुआ, भीतर वाला संसार तो है। वह समाप्त नहीं हुआ है। सारी गड़बड़ी भीतर वाला संसार की है। ये होता है तीन गुण वाली त्रिगुणात्मिका माया सत्व, रजो और तमो गुणों के कारण।
त्रिगुणात्मिका माया के प्रभाव से क्या होता है?
संसार में कोई भी जीव किसी भी जीव के मुआफिक (अनुकूल) नहीं हो सकता, कोई किसी के लिए कुछ कर ही नहीं सकता और जो कुछ भी करता है अपने स्वार्थ के लिए करता है, कोई किसी को अच्छा कह नहीं सकता, कोई किसी की प्रशंसा नहीं कर सकता।
उपरोक्त ये सब कब होगा? जब हम त्रिगुणात्मिका माया से उत्तीर्ण होंगे और हम भगवान को प्राप्त करेंगे, तब ये सब हो पाएगा।
13.संसार में न सुख है न दुःख है।
संसार में सुख नहीं है क्योंकि यदि संसार में सुख होता, तो एक वस्तु से जितना सुख मिलता है, उतना सबको मिलता और सदा मिलता। लेकिन ऐसा नहीं होता। किसी को एक वस्तु से सुख मिलता है, और कुछ समय के बाद वही सुख समाप्त हो जाता है, और उसीसे दुःख मिलने लगता है। उसी वस्तु में न सुख है न दुःख। हम जिस वस्तु या व्यक्ति में जितना सुख मान लेते हैं, उतना सुख हमको मिलता है जो क्षणिक है। इसलिए संसार में न सुख है न दुःख।
संसार में कोई अच्छे नहीं या कोई बुरे नहीं है।
मायाधीन और तीनों गुणों के कारण सब अपने स्वार्थ के लिए ही एक दूसरे से संबंध बनाये रखते हैं।
इसलिए संसार में न राग हो न द्वेष हो, उदासीन रहना चाहिए, तव भगवान की भक्ति कर पाएंगे।

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